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भारत, रूस और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते: वैश्विक विश्वसनीयता की बढ़ती कीमत

International  •  👁 5 views  •  06 Feb 2026
भारत, रूस और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते: वैश्विक विश्वसनीयता की बढ़ती कीमत
वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच भारत, रूस और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते केवल आर्थिक फैसले नहीं रह गए हैं, बल्कि वे विश्वसनीयता, कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक प्रतिबद्धताओं की कसौटी बन चुके हैं। तीनों देशों के साथ भारत के संबंध अलग-अलग ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक आधारों पर टिके हैं, लेकिन एक साथ संतुलन बनाए रखना दिन-ब-दिन अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
भारत और रूस के बीच दशकों पुराना रणनीतिक और रक्षा सहयोग रहा है। ऊर्जा, रक्षा उपकरण और परमाणु सहयोग जैसे क्षेत्रों में रूस भारत का अहम साझेदार है। हालांकि, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत के लिए व्यापारिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। सस्ते रूसी तेल का लाभ उठाने के साथ-साथ भारत को अपनी वैश्विक छवि और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता भी दिखानी पड़ रही है।
दूसरी ओर, अमेरिका के साथ भारत के व्यापार और रणनीतिक रिश्ते तेजी से मजबूत हुए हैं। टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, रक्षा और निवेश के क्षेत्र में अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखता है। लेकिन अमेरिका यह भी अपेक्षा करता है कि भारत वैश्विक मुद्दों पर उसके दृष्टिकोण के करीब रहे, खासकर रूस जैसे संवेदनशील मामलों में।
इन तीनों शक्तियों के साथ व्यापार समझौतों में भारत के लिए “विश्वसनीयता की कीमत” यही है कि उसे हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ता है। किसी एक पक्ष के प्रति झुकाव दूसरे पक्ष में अविश्वास पैदा कर सकता है। भारत की बहुपक्षीय विदेश नीति का उद्देश्य रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है, लेकिन यह संतुलन आर्थिक लाभ और वैश्विक भरोसे के बीच लगातार परीक्षा से गुजर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की कूटनीति की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भरोसेमंद और स्थिर साझेदार की छवि कैसे बनाए रखता है।