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योगेंद्र यादव का नजरिया: गणराज्य के खोते अर्थ और उन्हें फिर से हासिल करने की राजनीतिक चुनौती

Politics   •   👁 12 views   •   27 Jan 2026
योगेंद्र यादव का नजरिया: गणराज्य के खोते अर्थ और उन्हें फिर से हासिल करने की राजनीतिक चुनौती
भारत आज एक गहरी राजनीतिक और लोकतांत्रिक चुनौती के दौर से गुजर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक चिंतक योगेंद्र यादव का मानना है कि इस संकट का मूल कारण गणराज्य के उन मूल अर्थों का कमजोर पड़ना है, जिन पर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है। अपने लेख में वह नागरिकों से आह्वान करते हैं कि वे अपने समय की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना करने के लिए गणराज्य की आत्मा को फिर से पहचानें और उसे पुनर्जीवित करें।
योगेंद्र यादव के अनुसार, गणराज्य केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह नागरिक समानता, संवैधानिक नैतिकता और जनभागीदारी का जीवंत विचार है। जब सत्ता कुछ हाथों में सिमटने लगती है, संस्थाएं कमजोर होती हैं और असहमति को देशद्रोह के रूप में देखा जाने लगता है, तब गणराज्य का वास्तविक अर्थ खोने लगता है।
वह चेतावनी देते हैं कि लोकतंत्र को केवल बहुमत के शासन तक सीमित कर देना खतरनाक है। एक सच्चा गणराज्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है और सत्ता को कानून के दायरे में रखता है। आज की राजनीति में, योगेंद्र यादव के मुताबिक, इन्हीं मूल्यों को सबसे ज्यादा चुनौती मिल रही है।
लेख में यह भी कहा गया है कि नागरिकों की भूमिका सिर्फ मतदाता तक सीमित नहीं होनी चाहिए। गणराज्य को जीवित रखने के लिए जागरूक नागरिक, मजबूत सामाजिक आंदोलनों और स्वतंत्र संस्थाओं की जरूरत है। सवाल पूछना, असहमति जताना और सत्ता को जवाबदेह ठहराना गणराज्य के बुनियादी कर्तव्य हैं।
योगेंद्र यादव का यह लेख एक वैचारिक अपील है—लोकतंत्र को बचाने की नहीं, बल्कि गणराज्य के खोए हुए अर्थों को फिर से हासिल करने की। उनके मुताबिक, यही हमारे समय की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है, और इसका समाधान भी नागरिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों में ही निहित है।