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आर्थिक सर्वे 2026: गुड्स ट्रेड डेफिसिट और एफपीआई पर निर्भरता से रुपये की स्थिरता क्यों प्रभावित होती है?

Economy  •  👁 18 views  •  29 Jan 2026
आर्थिक सर्वे 2026: गुड्स ट्रेड डेफिसिट और एफपीआई पर निर्भरता से रुपये की स्थिरता क्यों प्रभावित होती है?
हालिया आर्थिक सर्वे 2026 में कहा गया है कि भारतीय रुपये (INR) की अस्थिरता के पीछे कई आर्थिक कारक हैं, जिनमें विशेष रूप से माल व्यापार घाटा (Goods Trade Deficit) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) पर निर्भरता शामिल है। ये दोनों कारक रुपये की स्थिरता को प्रभावित करते हैं और बाजार में दबाव पैदा करते हैं।
सबसे पहले, भारत गुड्स ट्रेड डेफिसिट का सामना कर रहा है, यानी माल के आयात की मात्रा निर्यात से कहीं अधिक है। इस वजह से विदेशी मुद्रा (जैसे अमेरिकी डॉलर) की माँग बढ़ जाती है। जब देश को ज्यादा डॉलर खरीदने होते हैं — खासकर तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल के लिए — तो रुपये की मांग गिरती है और डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपया कमजोर होता है। हालांकि भारत की सेवा निर्यात और रेमिटेंस कुछ हद तक व्यापार घाटे को संतुलित करते हैं, परंतु यह पर्याप्त नहीं है ताकि गुड्स ट्रेड घाटे का पूरा प्रभाव कम किया जा सके।
दूसरा बड़ा कारक है विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPIs) पर निर्भरता। भारत जैसे उभरते बाजार में विदेशी निवेशकइक्विटी और बॉन्ड मार्केट में निवेश करते हैं। जब वैश्विक जोखिम बढ़ता है या बेहतर अवसर दूसरी जगह दिखाई देते हैं, विदेशी निवेशक पूंजी वापस अपने देशों में ले जाते हैं। इसे FPI आउटफ्लोज़ कहते हैं। जब निवेशक पैसा निकालते हैं, तो वे अपने भारतीय संपत्ति को बेच कर रुपये को डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की माँग बढ़ती है और रुपये की कीमत गिरती है।
आर्थिक सर्वे के अनुसार, भारत विदेशी पूंजी पर इस हद तक निर्भर है कि यदि ये प्रवाह सूख जाते हैं, तो रुपये की स्थिरता “गंभीर रूप से प्रभावित” हो जाती है। ऐसे समय में विदेशी पूंजी का बहिर्वाह रुपये पर दबाव डाल सकता है और यह उसकी अस्थिरता का एक प्रमुख कारण बन जाता है।
सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ऐसे दबावों को कम करने के लिए नीतिगत उपायों पर काम कर रहे हैं, जैसे निर्यात को बढ़ावा देना, व्यापार घाटे को नियंत्रित करना और विदेशी निवेश को आकर्षित रखना। इन उपायों से दीर्घकालिक रूप से रुपये की स्थिरता में सुधार की संभावना बनी रहती है।
संक्षेप में: रुपये की स्थिरता प्रभावित होने के मुख्य कारणों में गुड्स ट्रेड डेफिसिट से बढ़ती डॉलर की मांग और FPIs के बहिर्वाह के कारण विदेशी मुद्रा का दबाव शामिल है, जो निवेशकों की संवेदनशीलता और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के चलते और भी जटिल हो जाता है।