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रिसर्च कॉन्फ्लुएंस 2026: परंपरा और नवाचार के संगम से सतत वस्त्र उद्योग में भारत बन सकता है वैश्विक नेतृत्वकर्ता

Economy  •  👁 14 views  •  31 Jan 2026
रिसर्च कॉन्फ्लुएंस 2026: परंपरा और नवाचार के संगम से सतत वस्त्र उद्योग में भारत बन सकता है वैश्विक नेतृत्वकर्ता
रिसर्च कॉन्फ्लुएंस 2026 के मंच से भारत के वस्त्र क्षेत्र को लेकर एक दूरदर्शी विचार सामने आया है। विशेषज्ञों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि भारत अपनी समृद्ध परंपराओं का सम्मान करते हुए रचनात्मक नवाचार को अपनाए, तो वह सतत (सस्टेनेबल) वस्त्र उद्योग में वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर सकता है। यह सम्मेलन अनुसंधान, नवाचार और नीति निर्माण के क्षेत्र में संवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि भारत के पास हथकरघा, हस्तशिल्प, प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक बुनाई तकनीकों जैसी अमूल्य विरासत है, जो पर्यावरण के अनुकूल वस्त्र निर्माण की मजबूत नींव प्रदान करती है। इन पारंपरिक तरीकों को आधुनिक तकनीक, डिज़ाइन सोच और नवाचार के साथ जोड़ा जाए, तो भारत न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकता है, बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी विशिष्ट पहचान भी बना सकता है।
रिसर्च कॉन्फ्लुएंस 2026 में यह भी जोर दिया गया कि टिकाऊ वस्त्र केवल पर्यावरणीय जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अवसर भी हैं। नवाचार आधारित अनुसंधान, स्टार्टअप्स की भागीदारी और शिक्षा संस्थानों के सहयोग से वस्त्र उद्योग में रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। साथ ही, ग्रामीण कारीगरों और बुनकरों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला से जोड़कर उनकी आजीविका को भी मजबूत किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने सरकार, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता पर बल दिया। नीति समर्थन, अनुसंधान में निवेश और डिजाइन नवाचार के माध्यम से भारत सस्टेनेबल टेक्सटाइल्स के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
सम्मेलन का निष्कर्ष यही रहा कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलन ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। यदि इस संतुलन को सही दिशा में आगे बढ़ाया गया, तो भारत आने वाले वर्षों में सतत वस्त्र उद्योग का वैश्विक केंद्र बन सकता है और दुनिया को एक जिम्मेदार, पर्यावरण-संवेदनशील विकास मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।