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सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार बनाया: स्कूलों को अब क्या-क्या करना होगा

Crime  •  👁 17 views  •  31 Jan 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार बनाया: स्कूलों को अब क्या-क्या करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) को मौलिक अधिकार के दायरे में शामिल करने की महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की कमी सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मासिक धर्म कोई शर्म या निजी विषय नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा है। यदि लड़कियों को उचित सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो वे स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं और उनके शैक्षणिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
स्कूलों को अब क्या-क्या देना होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए यह निर्देश दिया है कि:
लड़कियों के लिए सैनिटरी पैड्स मुफ्त या किफायती दरों पर उपलब्ध हों।
साफ और सुरक्षित शौचालय हों, जिसमें पर्याप्त पानी और साबुन की सुविधा हो।
उपयोग किए गए पैड्स के लिए सुरक्षित निस्तारण (डस्टबिन या इन्सिनरेटर) की व्यवस्था हो।
लड़कियों को मासिक धर्म स्वच्छता और स्वास्थ्य शिक्षा दी जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ा नहीं है, बल्कि लैंगिक समानता, शिक्षा और गरिमा को मजबूत करता है। इससे छात्रों को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलेगा और राज्यों पर जवाबदेही बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत में महिला-केंद्रित अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह न केवल लड़कियों को स्कूल में बने रहने में मदद करेगा, बल्कि पूरे समाज में मासिक धर्म और महिला स्वास्थ्य को सामान्य और सम्मानजनक विषय के रूप में स्वीकार करने की दिशा में भी असर डाल सकता है।