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डिकोड पॉलिटिक्स: RTI का सफर — ‘नए युग की शुरुआत’ से लेकर ‘बेकार की जिज्ञासा का टूल’ कहे जाने तक

Crime   •   👁 27 views   •   03 Feb 2026
डिकोड पॉलिटिक्स: RTI का सफर — ‘नए युग की शुरुआत’ से लेकर ‘बेकार की जिज्ञासा का टूल’ कहे जाने तक
सूचना का अधिकार कानून (RTI) को कभी भारतीय लोकतंत्र में “एक नए युग की शुरुआत” कहा गया था। 2005 में लागू हुए इस कानून ने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने और जवाब पाने की ताकत दी। पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिहाज़ से RTI को एक क्रांतिकारी कदम माना गया। लेकिन करीब दो दशक बाद, इसके भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शुरुआती वर्षों में RTI ने कई बड़े घोटालों, नीतिगत खामियों और प्रशासनिक लापरवाहियों को उजागर किया। गांवों से लेकर मंत्रालयों तक, आम लोग पहली बार सत्ता से सीधे सवाल पूछ पा रहे थे। RTI कार्यकर्ताओं की भूमिका मजबूत हुई और यह कानून लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक बन गया।
हालांकि समय के साथ सत्ता और प्रशासन का नजरिया बदलता गया। RTI को “बेकार की जिज्ञासा” या “सरकारी कामकाज में बाधा” बताने की आवाज़ें तेज़ होने लगीं। संशोधनों, नियमों में बदलाव और सूचना आयोगों में नियुक्तियों में देरी ने इस कानून की धार को कुंद किया है। कई मंत्रालय सूचना देने से बचने के रास्ते तलाशते नज़र आते हैं।
राजनीतिक स्तर पर RTI अब केवल पारदर्शिता का सवाल नहीं रह गया है। यह सत्ता और नागरिक के बीच शक्ति संतुलन की लड़ाई बन चुका है। आलोचकों का कहना है कि सरकारें असहज सवालों से बचने के लिए RTI को कमजोर करना चाहती हैं, जबकि समर्थकों के लिए यह आज भी जवाबदेही का सबसे प्रभावी औज़ार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि RTI का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि नागरिक समाज, मीडिया और न्यायपालिका इसे कितनी मजबूती से बचाते हैं। अगर इसे केवल “बेकार की जिज्ञासा” का साधन मान लिया गया, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी। लेकिन अगर इसकी मूल भावना—पारदर्शिता और जवाबदेही—को फिर से केंद्र में लाया गया, तो RTI एक बार फिर लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ बन सकता है।