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UGC इक्विटी रेगुलेशन से आर्टिकल 370 और CBI तक: सुप्रीम कोर्ट स्टे ऑर्डर पर कैसे फैसला करता है

Crime  •  👁 14 views  •  03 Feb 2026
UGC इक्विटी रेगुलेशन से आर्टिकल 370 और CBI तक: सुप्रीम कोर्ट स्टे ऑर्डर पर कैसे फैसला करता है
सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी कानून, नीति या सरकारी फैसले पर स्टे ऑर्डर देना हमेशा सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय रहता है। हाल के वर्षों में UGC इक्विटी रेगुलेशन, आर्टिकल 370 और CBI से जुड़े मामलों में कोर्ट के रुख ने यह सवाल और गहरा किया है कि आखिर शीर्ष अदालत स्टे देने या न देने का फैसला किस आधार पर करती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट स्टे ऑर्डर को असाधारण उपाय मानता है, न कि सामान्य प्रक्रिया। अदालत सबसे पहले यह देखती है कि याचिकाकर्ता का प्राइमा फेसि केस मजबूत है या नहीं, यानी पहली नज़र में क्या कानून या निर्णय असंवैधानिक या गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण प्रतीत होता है। उदाहरण के तौर पर, UGC इक्विटी रेगुलेशन से जुड़े मामलों में कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाले व्यापक असर को ध्यान में रखा।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू होता है अपूरणीय क्षति (Irreparable Harm)। अदालत यह जांचती है कि यदि स्टे नहीं दिया गया, तो क्या ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई बाद में संभव नहीं होगी। आर्टिकल 370 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से इनकार करते हुए कहा था कि संवैधानिक बदलावों को पूरी सुनवाई के बाद ही परखा जाएगा।
तीसरा आधार है संतुलन का सिद्धांत (Balance of Convenience)। कोर्ट यह तय करता है कि स्टे देने या न देने से किस पक्ष को अधिक नुकसान या लाभ होगा। CBI से जुड़े मामलों में अदालत ने अक्सर संस्थागत कामकाज और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी है।
सुप्रीम कोर्ट यह भी स्पष्ट करता रहा है कि केवल राजनीतिक विवाद या सार्वजनिक दबाव स्टे का आधार नहीं बन सकते। कोर्ट का उद्देश्य यथास्थिति बनाए रखना नहीं, बल्कि संविधान और कानून की रक्षा करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्टे ऑर्डर पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण न्यायिक संयम को दर्शाता है। चाहे मामला शिक्षा नीति का हो, संघीय ढांचे का या जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता का—कोर्ट हर केस में व्यापक प्रभाव, संवैधानिक मूल्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर ही फैसला करता है।