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‘मिया’ विवाद के बीच हिमंता बिस्वा सरमा का ध्रुवीकरण दांव: असम की राजनीति में क्यों बढ़ रहा है पहचान का संघर्ष?

Politics  •  👁 18 views  •  04 Feb 2026
‘मिया’ विवाद के बीच हिमंता बिस्वा सरमा का ध्रुवीकरण दांव: असम की राजनीति में क्यों बढ़ रहा है पहचान का संघर्ष?
असम की राजनीति एक बार फिर पहचान और ध्रुवीकरण के सवालों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। ‘मिया’ शब्द को लेकर उठे विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का आक्रामक रुख यह सवाल खड़ा करता है कि क्या राज्य की राजनीतिक लड़ाई अब विकास से हटकर पहचान की राजनीति की ओर बढ़ रही है।
‘मिया’ शब्द असम में लंबे समय से सांस्कृतिक और राजनीतिक विवाद का विषय रहा है। इसे एक समुदाय अपनी पहचान के रूप में देखता है, जबकि दूसरे वर्ग इसे अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव से जोड़कर देखता है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे चुनावी राजनीति में अक्सर भावनात्मक ध्रुवीकरण का साधन बन जाते हैं।
हिमंता सरमा की राजनीति को यदि करीब से देखा जाए, तो वह खुद को एक सख्त प्रशासक और निर्णायक नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। ध्रुवीकरण की राजनीति उन्हें एक स्पष्ट ‘हम बनाम वे’ का नैरेटिव गढ़ने में मदद करती है, जिससे बहुसंख्यक वोट बैंक को एकजुट करना आसान हो जाता है। असम जैसे सीमावर्ती राज्य में जहां नागरिकता, पहचान और संसाधनों का सवाल पहले से ही संवेदनशील है, यह रणनीति तेजी से असर दिखाती है।
आलोचकों का कहना है कि इस तरह की राजनीति सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर सकती है और असली मुद्दों—जैसे रोजगार, बाढ़, शिक्षा और स्वास्थ्य—से ध्यान भटका सकती है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि सरकार राज्य की सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा को लेकर स्पष्ट रुख अपना रही है, जो लंबे समय से जनता की मांग रही है।
कुल मिलाकर, ‘मिया’ विवाद के बीच ध्रुवीकरण का सहारा असम की राजनीति में एक सोची-समझी रणनीति दिखाई देता है। यह रणनीति चुनावी रूप से लाभकारी हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रभावों पर बहस जरूरी है।