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बड़े पैमाने पर कुत्तों के शेल्टर बनाना पब्लिक हेल्थ के लिए खतरा, दिखावे नहीं बल्कि साइंस आधारित समाधान जरूरी

Animals  •  👁 14 views  •  06 Jan 2026
बड़े पैमाने पर कुत्तों के शेल्टर बनाना पब्लिक हेल्थ के लिए खतरा, दिखावे नहीं बल्कि साइंस आधारित समाधान जरूरी
देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर बड़े पैमाने पर डॉग शेल्टर बनाने की मांग और पहल तेज होती जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों और पब्लिक हेल्थ से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह तरीका समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक नया खतरा बन सकता है। दिखावटी उपायों के बजाय साइंस आधारित और व्यावहारिक रणनीति अपनाने की जरूरत है।
पशु विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े डॉग शेल्टर अक्सर भीड़भाड़, गंदगी और बीमारियों का केंद्र बन जाते हैं। सीमित संसाधनों के कारण यहां साफ-सफाई, टीकाकरण और स्वास्थ्य निगरानी ठीक से नहीं हो पाती। नतीजतन, रेबीज, पार्वो वायरस और अन्य संक्रामक रोग तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है, जो न केवल जानवरों बल्कि इंसानों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि बड़े शेल्टर बनाना एक महंगा और अस्थायी समाधान है। इसमें हजारों कुत्तों को लंबे समय तक बंद रखना न तो मानवीय है और न ही वैज्ञानिक। इससे कुत्तों में आक्रामकता बढ़ सकती है और मानसिक तनाव भी गंभीर समस्या बन जाता है।
इसके विपरीत, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) प्रोग्राम, यानी नसबंदी और नियमित टीकाकरण, आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। जब कुत्तों की नसबंदी की जाती है और उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ा जाता है, तो वे नए कुत्तों के प्रवेश को रोकते हैं और जनसंख्या धीरे-धीरे नियंत्रित होती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि नीति निर्धारण में भावनाओं और दिखावे की बजाय डेटा, रिसर्च और पब्लिक हेल्थ के पहलुओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्थानीय निकायों को चाहिए कि वे जागरूकता अभियान, जिम्मेदार पालतू पशु पालन और वैज्ञानिक उपायों पर ध्यान दें।
निष्कर्ष रूप में, आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान बड़े शेल्टर नहीं, बल्कि साइंस आधारित, मानवीय और दीर्घकालिक रणनीति है, जो इंसानों और जानवरों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।