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गुजरात के चहरी‑धांड और उत्तर प्रदेश के एताह के पटना बर्ड सैंक्चुअरी को Ramsar स्थल की मान्यता

National  •  👁 20 views  •  31 Jan 2026
गुजरात के चहरी‑धांड और उत्तर प्रदेश के एताह के पटना बर्ड सैंक्चुअरी को Ramsar स्थल की मान्यता
नई दिल्ली: भारत ने दुनिया भर के महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि (wetlands) के संरक्षण के लिए स्थापित Ramsar Convention की सूची में दो और स्थलों को शामिल कर लिया है — गुजरात के चहरी‑धांड (Chhari‑Dhand) और उत्तर प्रदेश के एताह स्थित पटना बर्ड सैंक्चुअरी (Patna Bird Sanctuary)। यह घोषणा विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) से ठीक पहले की गई है, जो हर साल 2 फरवरी को मनाया जाता है।
चहरी‑धांड, गुजरात के कutch (कच्छ) जिले में स्थित एक मौसमी खारी (seasonal saline) आर्द्रभूमि है, जो बन्नी घास के मैदान (Banni grasslands) और नमक के मैदानों के बीच फैला हुआ है। यह स्थल विशेष रूप से जलपक्षियों के लिए महत्वपूर्ण शीतकालीन आधार (wintering site) है, और प्रत्येक साल यहाँ लगभग 30,000 कॉमन क्रेन (Common Cranes) सहित कई अन्य प्रवासी पक्षी आते हैं। इसके अलावा यहाँ क्रिटिकली एन्डेंजरड (critically endangered) और नाज़ुक (vulnerable) पक्षी प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं।
पटना बर्ड सैंक्चुअरी, उत्तर प्रदेश के एताह जिले में स्थित है और ताज़ा पानी के दलदली भाग, जंगल और घास के मैदानों का मिश्रण है। यह स्थल 178 पक्षी प्रजातियों और 252 पौधों की प्रजातियों का घर है, और BirdLife International द्वारा इसे एक महत्वपूर्ण पक्षी और जैव विविधता क्षेत्र (Important Bird and Biodiversity Area – IBA) भी घोषित किया गया है।
इन दोनों स्थलों को Ramsar साइट का दर्जा मिलने से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा को मजबूती मिलेगी, बल्कि प्रवासी और स्थानिक पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास भी सुनिश्चित होगा। यह भारत के Ramsar नेटवर्क को 98 साइटों तक बढ़ा देता है, जो देश की पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव दोनों ने इस उपलब्धि पर खुशी जताई है और इसे जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिकी संतुलन और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के लिए एक सकारात्मक कदम बताया है।
Ramsar साइट की मान्यता पाने के बाद इन आर्द्रभूमियों का सतत प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, और पर्यावरणीय क्षरण को रोकना सरकार और स्थानीय समुदायों की साझा जिम्मेदारी बन गई है।